सामाजिक समता व सामाजिक न्याय
इस लेख में उदाहरण और परिप्रेक्ष्य विषय के विश्वव्यापी दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं । ( जनवरी 2022 )
सामाजिक समानता मामलों की एक स्थिति है जिसमें एक विशिष्ट समाज के भीतर सभी व्यक्तियों को समान अधिकार, स्वतंत्रता और स्थिति है, संभवतः नागरिक अधिकार , अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता , स्वायत्तता और कुछ सार्वजनिक वस्तुओं और सामाजिक सेवाओं तक समान पहुंच शामिल है । सामाजिक समानता के लिए कानूनी रूप से लागू सामाजिक वर्ग या जाति की सीमाओं की अनुपस्थिति और किसी व्यक्ति की पहचान के एक अविच्छेद्य भाग से प्रेरित भेदभाव की अनुपस्थिति की आवश्यकता होती है। [1] उदाहरण के लिए, सामाजिक समानता के पैरोकार कानून के समक्ष समानता में विश्वास करते हैंलिंग, लिंग, जातीयता, आयु, यौन अभिविन्यास, मूल, जाति या वर्ग, आय या संपत्ति, भाषा, धर्म, दृढ़ विश्वास, राय, स्वास्थ्य, या अक्षमता की परवाह किए बिना सभी व्यक्तियों के लिए। [2] [3] सामाजिक समानता समान अवसर से संबंधित है ।
सैन फ्रांसिस्को, संयुक्त राज्य अमेरिका में विवाह समर्थक समानता रैली।
अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में विवाह समर्थक समानता रैली
परिभाषा
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सामाजिक समानता को विभिन्न विचारधाराओं द्वारा विभिन्न प्रकार से परिभाषित और मापा जाता है। इनमें शक्ति की समानता , अधिकार, सामान , अवसर , क्षमताएं, या इन चीजों का कुछ संयोजन शामिल है। यह वितरणात्मक समानता, व्यक्तियों के बीच शक्ति संरचनाओं, या न्याय और राजनीतिक समतावाद की तुलना में भी परिभाषित किया जा सकता है । सामाजिक समानता को बढ़ावा देने वाले समाज आम तौर पर रैंक या सामाजिक वर्ग के भेद नहीं करते हैं , और सामाजिक समानता की व्यवस्था के तहत पारस्परिक संबंध आम तौर पर पारस्परिक सम्मान और समान मूल्य के आदर्श पर आधारित होते हैंपदानुक्रम या सम्मान । कई अलग-अलग विचारधाराएँ साम्यवाद , अराजकतावाद , बहुसंस्कृतिवाद , गणतंत्रवाद , लोकतंत्र , समाजवाद और सामाजिक लोकतंत्र सहित सामाजिक समानता के विचारों से आकर्षित होती हैं । सामाजिक समानता की वकालत समतावाद है । [4] सामाजिक समानता समाज में दुर्भाग्यशाली लोगों की पीड़ा को कम करने से अलग है। यह आदर्श की अभिव्यक्ति है कि समाज में किन्हीं दो व्यक्तियों के साथ समान स्तर का सम्मान किया जाना चाहिए और सामाजिक स्थिति या पदानुक्रम की परवाह किए बिना समाज में भाग लेने का समान अधिकार होना चाहिए। [5]
सामाजिक समानता अक्सर इस बात से संबंधित होती है कि कैसे व्यक्ति एक समाज के भीतर एक दूसरे से संबंधित होते हैं, हालांकि इसे समाजों के बीच बातचीत में भी माना जा सकता है। सामाजिक पदानुक्रम राज्यों या उनके नागरिकों के बीच तब बन सकते हैं जब उनके बीच शक्ति असमानताएं मौजूद हों, विशेष रूप से वैश्वीकरण के संदर्भ में । ये असमानताएं अक्सर प्रकार और दायरे में भिन्न होती हैं, क्योंकि विभिन्न राज्यों में नागरिक एक सामान्य समुदाय या सामाजिक वातावरण साझा नहीं करते हैं। [6] जैसे-जैसे सामाजिक समानता में प्रगति होती है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और समाज के भीतर, सामाजिक असमानता के दायरे का विस्तार होता है क्योंकि सामाजिक असमानता के नए रूप स्पष्ट हो जाते हैं और नए समाधान संभव हो जाते हैं। [7]
पॉलीसेमिक और प्रोटीन अवधारणा
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और अधिक जानें
यह खंड एक व्यक्तिगत प्रतिबिंब, व्यक्तिगत निबंध, या तर्कपूर्ण निबंध की तरह लिखा गया है जो विकिपीडिया संपादक की व्यक्तिगत भावनाओं को बताता है या किसी विषय के बारे में एक मूल तर्क प्रस्तुत करता है। ( फरवरी 2022 )
सर्वप्रथम, अरस्तू द्वारा किए गए भेद के अनुसार , समानता [8] में केवल एक कसौटी (आनुपातिक समानता) या शुद्ध गणितीय समानता के सापेक्ष भागों के बीच का अंतर शामिल है।
लेकिन वस्तुओं (व्यक्तियों और परिस्थितियों) की बहुलता जहां यह लागू होती है, "सामाजिक समानता" की अवधारणा को संबंधित वस्तुओं के रूप में विविध और बहुरूप बनाती है। एक सरल सैद्धांतिक परिभाषा की असंभवता के बावजूद, अवधारणा ने अधिक से अधिक विभिन्न अक्षों के साथ आयोजित किए जाने वाले व्यावहारिक मूल्यांकन में इसकी प्रासंगिकता पाई है:
भौगोलिक: क्या सामाजिक समानता एक क्षेत्र के संदर्भ के बिना, एक मानव समाज के लिए, एकजुटता या जिम्मेदारी के लिंक के अस्तित्व के बिना बोधगम्य है? [9]
लौकिक: क्या सामाजिक समानता की तत्काल सराहना की जाती है या इसे भविष्य में खुद को प्रोजेक्ट करना चाहिए? क्या अंतर-पीढ़ीगत समानता की अवधारणा समझ में आती है ( सतत विकास के सिद्धांतों पर लौटना )?
कानूनी: क्या सामाजिक समानता, अधिकारों के आवश्यक और औपचारिक सिद्धांतों द्वारा स्थापित, गारंटी की परीक्षा और वास्तविक अधिकारों के अभ्यास की सहायता में इसे तेजी से लंबा करने और उनसे परे जाने की ओर नहीं ले जाती है ?
राजनीतिक: लोकतंत्र में सामाजिक समानता वोट देने के अधिकार , बोलने की स्वतंत्रता , लेकिन सूचना के निपटान की प्रभावी संभावना और इन अधिकारों के मुक्त प्रयोग को मानती है। शिक्षा, उपचार, संस्कृति तक पहुंच के बारे में क्या? इस दृष्टिकोण से बंद समाज असमतावादी समाज हैं।
आर्थिक: क्या संसाधनों की समानता, सख्त समतावाद , सामाजिक न्याय की गारंटी के लिए आवश्यक है ? क्या कोई ऐसा न्यूनतम है जिसके नीचे लोगों की गरिमा , योग्यता और क्षमता को मान्यता नहीं दी जाती है? हालांकि कई लोगों के लिए इस समानता को एक असंभव आदर्श के रूप में देखा जाता है, शर्तों की समानता के अभाव में, क्या समान अवसर के साथ स्वयं को संतुष्ट करना चाहिए ?
नृशास्त्रीय: रोनाल्ड ड्वोर्किन , गोले के साथ अपने अनुभव में, इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि "प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान विचार" का लक्ष्य रखने के लिए नियामक सिद्धांत है। [ इस उद्धरण को उद्धरण की आवश्यकता है ]
ऐतिहासिक उदाहरण
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कई मोर्चों पर इस एप्लिकेशन के पक्ष में लड़ी गई लड़ाई का वर्णन निम्नलिखित प्रकरणों में किया गया है:
विशेषाधिकारों के उन्मूलन के मद्देनजर 1789 की फ्रांसीसी क्रांति
याल्टा सम्मेलन में महान शक्तियों के बीच महसूस की गई दुनिया की तुलना में बांडुंग सम्मेलन और अन्य उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों ने दुनिया के बेहतर बंटवारे को पुनः प्राप्त किया
संयुक्त राष्ट्र जो - अपने विशेष संस्थानों द्वारा - अपने सदस्यों के बीच अधिक स्थिर और ठोस संवाद और सहयोग को बढ़ावा देना चाहता है
फ्रांस में, ट्रेड यूनियन आंदोलन (1936 में) या धर्मार्थ आंदोलन, जैसे कि फ्रांस में अब्बे पियरे , अंतर्राष्ट्रीय आंदोलन एटीडी फोर्थ वर्ल्ड
समान अवसरों की स्थापना की अपील इस विचार की अपील करती है कि लोगों को जीवन में प्रयास करने के लिए समान परिस्थितियों में होना चाहिए (ठोस पहल के साथ, जैसे कि माइक्रोक्रेडिट के पक्ष में मुहम्मद यूनुस )
दार्शनिक इतिहास
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प्राचीन ग्रीक दर्शन में सामाजिक समानता की प्रारंभिक अवधारणाएँ दिखाई देती हैं । स्टोइक दार्शनिकों का मानना था कि मानव कारण सार्वभौमिक है। प्लेटो ने गणतंत्र में एक समाज का निर्माण करते समय समानता की प्रकृति पर विचार किया , जिसमें मठवासी समानता और भ्रष्टाचार में समानता दोनों शामिल हैं। [10] अरस्तू ने भी समानता की एक अवधारणा विकसित की, विशेष रूप से नागरिकता के संबंध में , हालांकि उन्होंने सामाजिक पदानुक्रम के पक्ष में कुल सामाजिक समानता की अवधारणा को खारिज कर दिया। [11] सुधार के दौरान यूरोप में सामाजिक समानता समाज के एक व्यावहारिक तत्व के रूप में विकसित हुईजिसमें पारंपरिक धार्मिक पदानुक्रम को चुनौती दी गई थी। सुधार के बाद के राजनीतिक दर्शन के विकास ने सामाजिक समानता के लिए एक धर्मनिरपेक्ष आधार प्रदान किया और व्यवहार में सामाजिक समानता का विश्लेषण करने के लिए राजनीति विज्ञान ने अनुभवजन्य प्रणालियों का निर्माण किया। [10]
सामाजिक समानता की समकालीन धारणा 20वीं सदी में जॉन रॉल्स , रोनाल्ड डॉर्क
सामाजिक न्याय
सामाजिक आंतरक्रियांमध्ये सामाजिक न्यायाचे पाच वेगवेगळे प्रकार संभवतात
सामाजिक न्याय
( सोशल जस्टिस ). समाजमान्य मूल्यांवर अधिष्ठित hअसलेली न्यायाची संकल्पना. तिच्याबद्दल वेगवेगळी मते आहेत आणि ती सर्व वास्तववादी आहेत. सामाजिक न्याय ही नीतिमूल्यांवर आधारलेली संकल्पना आहे. ती सामाजिक धोरणांमध्ये, राज्यशास्त्र आणि राजकीय नियोजनामध्ये, कायद्यामध्ये, तत्त्वज्ञानात आणि सामाजिक शास्त्रांच्या उगमस्थानात विचारात घ्यावी लागते. सामाजिक जीवनातील मध्यवर्ती असणारे नैतिक प्रमाण सामाजिक न्यायात अध्याहृत असते. ‘सामाजिक न्याय’ सामाजिक सिद्घांत आणि सामाजिक किया या दोन्हींमध्ये महत्त्वाची भूमिका बजावतो, त्यामुळेच सर्व सामाजिक शास्त्रे ह्या संकल्पनेला मूलभूत मानतात. कोणतेही समाजमान्य श्रम करणारी व्यक्ती ही न्याय्य श्रम करीत असते;परंतु चोर किंवा दरोडेखोर यांची कृती वा श्रम अन्यायकारक ठरतात. व्यक्तीची कुवत आणि तिचे हित एका बाजूला आणि समाजाचे हित दुसऱ्या बाजूला यांची परस्पर उपकारक अशी समतोल सांगड जेव्हा घातली जाते, तेव्हा समाजात न्याय प्रस्थापित झाला असे म्हणता येईल. व्यक्तिव्यक्तींमध्ये कुवत, आवड–निवड आदींबाबत भिन्नता असते; तथापि व्यक्तिव्यक्तींमध्ये आणि व्यक्ती व समाज यांमध्ये सुसंवाद व समतोल साधावा लागतो. म्हणजेच सामाजिक स्थैर्य प्रस्थापित होऊन प्रगती होते.
सामाजिक न्याय दोन प्रकारचे असतात : पहिला, औपचारिक न्याय, जो न्यायसंस्था–कायद्यांमधील तरतुदींनुसार दोषी व्यक्तींना शिक्षा देऊन कार्यवाहीत येतो. अशा सामाजिक न्यायाचे स्वरूप कायदेशीर आणि गुन्हेगारीशास्त्राशी निगडित असते.अशा न्यायाचे स्वरूप ‘देवाने दिलेली शिक्षा’ असेही मानले जाते. ‘देवाने दिलेले शासन’ हा एक सिद्घांत मानसशास्त्रीय साहित्यात महत्त्वाचा मानला जातो.
दुसरा, अनौपचारिक न्याय, जो नैतिकता आणि राजकीय परिस्थितीशी संबंधित असतो. तो विधायक आणि माणुसकीचा निकष लावून समाजात उपलब्ध असलेल्या चांगल्या–वाईटाचे वाटप करण्यावरून दिला जातो. योग्य निकष लावून हक्कांचे वितरण केले जाते. यामध्ये दोषी लोकांना शिक्षा दिली जाते, ती केवळ इतरांनी पुन्हा वाईट वागू नये म्हणून. ह्या शिक्षेमुळे पीडितांना,दुर्बलांना सामाजिक न्याय पूर्णपणे मिळत नाही; परंतु अशा होणाऱ्या शिक्षा तात्पुरत्या दहशत निर्माण करतात.
सामाजिक आंतरक्रियांमध्ये सामाजिक न्यायाचे पाच वेगवेगळे प्रकार संभवतात
(१) व्यक्तीच्या, समूहाच्या किंवा समाजाच्या संदर्भात न्याय समप्रमाणात मिळाला किंवा नाही, अन्याय झाला का ? झाला असल्यास त्याची कारणमीमांसा करता आली पाहिजे.
(२) दुसऱ्या प्रकारे सामाजिक न्यायाचे वितरण ज्याचे ज्याचे हक्क, कर्तव्ये किंवा जे जे मालकीचे आहे, ते ते त्याला मिळाले का हे पाहणे होय. हा न्याय योग्य वितरणाचा आहे. लोकशाहीमध्ये प्रत्येक नागरिकाला अन्न, वस्त्र, निवारा, आरोग्य,शिक्षण मिळण्याचा मूलभूत अधिकार आहे. जगण्याचा, भाषणाचा, संघटन करण्याचा, मतदानाचा हक्क आहे. हे हक्क त्याला उपभोगावयास मिळतात किंवा नाही, हे साध्य करण्यासाठी केंद्र शासन आणि घटक राज्यांची शासने यांनी कायदे करावेत,असे मार्गदर्शन राज्यघटनेत करण्यात आले आहे. प्रत्येक राज्याच्या सरकारांकडे त्यांच्यावर सोपविलेल्या विषयांची सूची दिलेली आहे. उदा., गुन्हेगारांसंबंधीचे प्रशासन राज्य सरकारांकडे आहे. राष्ट्रीय पातळीवर एखादे धोरण आखले गेले, तर त्याची अंमलबजावणी मात्र राज्यांनी करावयाची असते.
(३) सामाजिक न्याय–अन्यायाचा प्रश्न कार्यवाही करण्याबाबत उद्भवतो. गुन्हेगारांकडून झालेले नुकसान पुरेसे भरून मिळाले नाही; म्हणून न्याय मिळाला नाही असे वाटते. पूर्वीच्या काळी ‘जशास तसे’ हे प्रमाण लागू करून ‘डोळ्यास डोळ्याने भरपाई’, ‘खुनास खून’ इ. प्रकारे कारवाई होत असे. मानवी अधिकार हे अधिक नैतिक, बुद्घिनिष्ठ, तार्किक तत्त्वांवर आधारित आहेत आणि म्हणून या जुन्या कार्यवाहींना आधुनिक काळात महत्त्व देऊनये असे मानले गेले.
(४) वंश, जात, धर्म, संपत्ती, मानमरातब, पदव्या यांमुळे निर्माण होणारी विषमता नष्ट करून सर्वांनासमान मूलभूत हक्क राज्यघटनेने बहाल केले आहेत. तसेच कायद्याचे संरक्षणही सर्वांना समान देण्यात आले आहे. म्हणजेचप्रत्येकाला समान/सारखीच संधी मिळाली पाहिजे.
(५) समन्यायी वाटप/संधी हा प्रकार स्वीकारणे गरजेचे वाटते. जे गट,समूह, प्रदेश दुर्बल आहेत; ज्या व्यक्ती गरीब आहेत; मुले निराधार आहेत अशा सर्वांचा प्राधान्याने विचार केला, तर त्या व्यक्तीवा समूह इतरांबरोबरच्या स्पर्धेत टिकू शकतील, प्रदेशांचे मागासपण दूर होईल आणि कालांतराने सर्वांना समाजातील संपत्तीसमन्यायी तत्त्वांनुसार उपभोगता येईल. (विशेष संधीचा सिद्घांत).
समता, स्वातंत्र्य, विश्वबंधुत्व, आर्थिक, राजकीय, सामाजिक हक्क, स्त्री–पुरुष समानता, समाजातील सर्व व्यक्तींना शिक्षणाची,विकासाची संधी आदी मूल्ये आणि तत्त्वे ही सामाजिक न्यायाची उद्दिष्टे होत. न्याय ही मानवी संकल्पना असल्यामुळे ती गतिमानआहे. न्यायाची कल्पना भिन्नभिन्न समाजांत वेगळी असते. तसेच कालानुसार तिच्यात फेरबदल होतात. काल न्याय्य वाटणारीगोष्ट विद्यमान परिस्थितीत अन्याय्य वाटू शकते. कधीकधी याउलटही स्थिती असते. उदा., पूर्वी पाश्चात्त्य देशांत (इंग्लंड)पुरुषांनाच फक्त मताधिकार होता. तो १९२८ पर्यंत योग्य व न्याय्य मानला जाई. आता स्त्री–पुरुष समानतेची कल्पना सर्वत्रसमाजमान्य झाल्यामुळे स्त्रीला मतदानाचा हक्क नाकारणे अन्यायाचे होईल; तथापि काही समाजांत अद्यापि स्त्रीकडे पाहण्याचादृष्टिकोन उपभोग्य वस्तू असा असून तिथे स्त्रियांची खरेदी–विक्री होते किंवा सार्वजनिक जीवनात त्यांना स्थान नाही. येथीलसमाजाला त्यात काही अन्यायकारक वाटत नाही आणि महत्त्वाचे म्हणजे स्त्रियांनाही आपल्यावर अन्याय होतो, असे वाटतनाही. त्यामुळे न्याय–अन्याय ठरविणे कठीण होते. या गतिमान संकल्पनेला तत्कालीन समाजाची मान्यता आवश्यक असूनसमाजमान्य मूल्यांवर न्यायाची संकल्पना अधिष्ठित असते, हा निष्कर्ष यातून काढता येईल. म्हणून न्याय म्हणजे काय आणिअन्याय म्हणजे काय, याची जाणीव समाजाला होणे महत्त्वाचे आहे. समाजात जेव्हा अन्यायाची जाणीव होते, तेव्हा त्याचेपरिमार्जन करण्याकरिता प्रतिकारार्थ चळवळी निर्माण होतात. सती, बालविवाह, अस्पृश्यता, हुंडा, तलाक या दुष्ट रुढींविरुद्घसमाजाला दीर्घकाळ संघर्ष करावा लागला; तरीसुद्घा अद्यापि या सर्व रुढींचे समूळ उच्चटन झाले आहे, असे ठामपणे सांगतायेत नाही.
महाराष्ट्र शासनाने शाहू महाराज यांच्या जयंतीनिमित्त २६ जून हा ‘सामाजिक न्याय दिन’ म्हणून घोषित केला आहे. या दिनाचे औचित्य साधून आपण सार्यांनी ‘सामाजिक न्याया’ची संकल्पना समजून घेणे क्रमप्राप्त आहे.
आज दि. २६ जून. ब्रिटिश राजसत्तेच्या काळामध्ये सामान्य जनतेला न्याय मिळवून देण्यासाठी व बहुजन समाजाच्या एकूणच सामाजिक उन्नतीसाठी लढणारे सामाजिक परिवर्तनाला गती प्राप्त करून, सनातनी वर्गाच्या विरोधाला न जुमानता, दलित व मागासवर्गीय समाजाच्या विकासासाठी महत्त्वाची भूमिका बजावणार्या राजर्षी छत्रपती शाहू महाराज यांची जयंती. छत्रपती शाहू महाराज, राजर्षी शाहू महाराज, कोल्हापूरचे शाहू, चौथे शाहू अशा विविध नावांनी ते प्रसिद्ध आहेत. राजर्षी छत्रपती शाहू महाराज हे लोककल्याणकारी व क्रांतिकारी विचारांचा वारसा लाभलेले राजा होते. बहुजनांना शिक्षण, जातीभेद निर्मूलन, नोकर्यांमध्ये आरक्षण आणि स्त्रीमुक्तीसाठी कायदे करणारे ते सुधारणावादी समाजसुधारक होते. महात्मा जोतिबा फुलेंच्या मानवतावादी कार्याचा त्यांच्यावर फार मोठा पगडा होता. त्यामुळे कोल्हापूर संस्थानच्या गादीवर विराजमान झाल्यावर त्यांनी सर्वच स्तरावर सामाजिक सुधारणांचे कार्य केले.
महाराजांनी २८ वर्षे राज्यकारभार केला व या कालखंडात सामाजिक न्याय निर्माण करण्याचा कसोशीने प्रयत्न केला, म्हणूनच महाराष्ट्र शासनाने शाहू महाराज यांच्या जयंतीनिमित्त २६ जून हा ‘सामाजिक न्याय दिन’ म्हणून घोषित केला आहे. या दिनाचे औचित्य साधून आपण सार्यांनी ‘सामाजिक न्याया’ची संकल्पना समजून घेणे क्रमप्राप्त आहे.‘न्याय’ ही एक बहुआयामी संकल्पना आहे. मानवी समाजातील लोकांचे परस्पर संबंध हे हितकारक आणि प्रगतीला पूरक असावेत, यासाठी लोकशाही राज्यव्यवस्थेत लोकांचे स्वातंत्र्य, त्यांचे हक्क, कर्तव्ये, जबाबदार्या इत्यादींचे निकष ठरवले जातात. मग त्या निकषांवर आधारित नीतिनियम व कायदे राज्यसंस्थेने लागू करावेत, त्या कायद्यांचे पालन लोकांनी करणे हे बंधनकारक करावे, कायदे न पाळणे हा गुन्हा मानावा आणि गुन्ह्यासाठी त्याच्या स्वरूपानुसार शिक्षा देण्याची तरतूद असावी, अशी ‘न्याय’ या संकल्पनेची ढोबळ चौकट असते. स्वातंत्र्य, समता आणि परस्पर बंधुत्व ही न्यायाची अविभाज्य अंगे होत. समाजातील प्रत्येकाला समान स्वातंत्र्य व समान संधी उपलब्ध करून देणे आणि योग्य संधीच्या अभावी वर्षानुवर्षे आर्थिक-सामाजिक उपेक्षेच्या संकटात सापडलेल्यांना झुकते माप देऊन त्यांना इतरांच्या पातळीवर आणणे, हेही न्यायाचेच एक द्योतक होय.
‘सामाजिक न्याय’ ही संकल्पना सर्वप्रथम १,५०० ते २,५०० वर्षांपूर्वी ज्यूडाइझम, ख्रिश्चन, इस्लाम, बौद्ध, हिंदू धर्म इत्यादींच्या शिकवणुकीतून व त्याच काळातील ‘सोफोक्लिझ’ व ‘एस्किलिस’च्या ग्रीक शोकांतिकांसारख्या पाश्चिमात्य साहित्यातून अवतरली. त्यानंतर धर्मांचे संस्थीकरण होऊन ते राज्ये आणि साम्राज्यांशी जोडले गेल्यामुळे न्यायाच्या संकल्पनेचा नैसर्गिक विकास खुंटला. त्यानंतर सामाजिक न्यायाच्या संकल्पनेचे पुनःप्रकटन हे सतराव्या व अठराव्या शतकांत पाश्चिमात्य समाजात धर्मनिरपेक्ष मानववाद, बुद्धिवाद, वैज्ञानिक क्रांती व प्रबोधनकाळ यांच्या वाढीबरोबर पाहायला मिळते. या नव्या परिप्रेक्ष्यात सामाजिक संरचनेचे विश्लेषण करणार्या रुसोसारख्या राजकीय तत्त्ववेत्त्यांनी समाजातील अन्यायकारक बाबींची चिकित्सा केली आणि त्यातूनच सामाजिक न्यायावर आधारित समाजरचनेच्या चौकटीला चालना मिळाली.
फ्रेंच राज्यक्रांतीच्या घोषणेतून (स्वातंत्र्य, समता, बंधुता) सामाजिक न्यायाचा स्पष्ट उद्घोष झाला आहे. यातील अनेक आधुनिक मूल्यांचे प्रतिबिंब आपल्याला भारताच्या संविधानात बघायला मिळते. विसाव्या शतकाच्या उत्तरार्धात जॉन रोल्स यांनी त्यांच्या ‘थिअरी ऑफ जस्टीस’ या पुस्त्त्यांनी ‘सामाजिक न्याया’ची संकल्पना मांडली आहे. त्यांच्या मते, “समाजाची मूलभूत संरचना हीच सत्ता व स्वातंत्र्य; अधिकार व संधी; मिळकत व संपत्ती इत्यादींशी संबंधित, यावर बेतलेल्या सामाजिक न्यायावर आधारित असली पाहिजे. माणसाच्या प्राथमिक गरजांची पूर्ती व्हायलाच पाहिजे म्हणजे सामाजिक न्याय.” रॉल्स यांनी न्याय हा सरकारच्या कायदा करणार्या शक्तीमधून नव्हे, तर जनतेच्या संमतीतून प्रकट झाला पाहिजे, या तत्त्वावर भर दिला आहे.
समता, स्वातंत्र्य, विश्वबंधुत्व, आर्थिक, राजकीय, सामाजिक हक्क, स्त्री-पुरुष समानता, समाजातील सर्व व्यक्तींना शिक्षणाची, विकासाची संधी आदी मूल्ये आणि तत्त्वे ही सामाजिक न्यायाची उद्दिष्टे होत. ‘न्याय’ ही मानवी संकल्पना असल्यामुळे ती गतिमान आहे. न्यायाची कल्पना भिन्न-भिन्न समाजात वेगवेगळी असते. तसेच कालानुसार तिच्यात फेरबदल होतात.
भांडवलशाहीच्या विकासप्रक्रियेतून सामाजिक न्यायाचे आदर्श आणि वास्तव यातील दरी रुंदावत गेली. काल न्याय्य वाटणारी गोष्ट विद्यमान परिस्थितीत अन्याय्य वाटू शकते. कधी-कधी याउलटही स्थिती असते.
सामाजिक न्याय मुख्यत्वे दोन प्रकारचे असतात.
(१) औपचारिक न्याय
(२) अनौपचारिक न्याय
भारतीय संविधानाच्या प्रास्ताविकेत भारत एक सार्वभौम, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकशाही गणराज्याचा उल्लेख आहे. सोबत विचार, अभिव्यक्ती, विश्वास, श्रद्धा व उपासनेचे स्वातंत्र्य, दर्जा व संधीची समानता, बंधुता, तसेच राजकीय, आर्थिक व सामाजिक न्यायाचा स्पष्ट उल्लेख आहे. ही मूल्ये डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांनी फ्रेंच क्रांतीतून नाही, तर गौतम बुद्धांच्या तत्त्वज्ञानातून घेतली आहेत. भारताच्या राज्यघटनेत मानवी प्रतिष्ठेविषयी सन्मान, समतेच्या तत्त्वांशी बांधिलकी आणि दुर्बल घटकांविषयी कळकळ, या तीन गोष्टी प्रखरतेने प्रतिबिंबित होतात. या तिन्हीबद्दलचे विवेचन राज्यघटनेच्या ‘भाग २ - मूलभूत अधिकार’ आणि ‘भाग ४ - राज्य धोरणाची निर्देशक तत्त्वे’ या दोन भागांतून दिसतात.
‘सामाजिक न्याय’ ही नीतिमूल्यांवर आधारलेली संकल्पना आहे. ती सामाजिक धोरणांमध्ये, राज्यशास्त्र आणि राजकीय नियोजनामध्ये, कायद्यामध्ये, तत्त्वज्ञानात आणि सामाजिक शास्त्रांच्या उगमस्थानात विचारात घ्यावी लागते. सामाजिक जीवनातील मध्यवर्ती असणारे नैतिक प्रमाण सामाजिक न्यायात अध्याहृत असते. ‘सामाजिक न्याय’ ‘सामाजिक सिद्घान्त’ आणि ‘सामाजिक क्रिया’ या दोन्हींमध्ये महत्त्वाची भूमिका बजावतो, त्यामुळेच सर्व सामाजिक शास्त्रे या संकल्पनेला मूलभूत मानतात. कोणतेही समाजमान्य श्रम करणारी व्यक्ती ही न्याय्य श्रम करीत असते. परंतु, चोर किंवा दरोडेखोर यांची कृती वा श्रम अन्यायकारक ठरतात. व्यक्तीची कुवत आणि तिचे हित एका बाजूला आणि समाजाचे हित दुसर्या बाजूला यांची परस्पर उपकारक अशी समतोल सांगड जेव्हा घातली जाते, तेव्हा समाजात न्याय प्रस्थापित झाला, असे म्हणता येईल.
‘सामाजिक न्याय’ हा एक राजकीय आणि तत्त्वज्ञानाचा सिद्धान्त आहे, जो असे प्रतिपादन करतो की, नागरी किंवा फौजदारी कायदा, आर्थिक पुरवठा आणि मागणी किंवा पारंपरिक नैतिक चौकट या तत्त्वांमध्ये मूर्त रूप असणार्या ‘न्याया’च्या संकल्पनेलाही काही परिमाण आहेत. ऐतिहासिकदृष्ट्या आणि सिद्धान्तानुसार, ‘सामाजिक न्याया’ची कल्पना अशी आहे की कायदेशीर, राजकीय, आर्थिक किंवा इतर परिस्थितीकडे दुर्लक्ष करून सर्व लोकांना संपत्ती, आरोग्य, कल्याण, न्याय, सुविधा आणि संधींमध्ये समान प्रवेश मिळाला पाहिजे.
‘सामाजिक न्याय’ हा समाजवादी आर्थिक व्यवस्थेचा आधार आहे हे काही धार्मिक परंपरांमध्येही शिकवले जाते. सर्वसाधारणपणे, सामाजिक न्यायाची उत्पत्ती ही नागरिकांसाठी विविध प्रकारच्या उपक्रमांद्वारे समान हक्कांना समर्थन देणारी एक व्यापक संकल्पना आहे. ‘सामाजिक न्याय’ विवादास्पद सिद्धान्ताशी आणि लोकांच्या गटातील आणि समाजातील काही भागांमधील भूतकाळातील किंवा चालू असलेल्या संघर्षाच्या चुकीच्या निराकरणाशी संबंधित आहे. हे एकतर बहुतेकदा अशा लोकसंख्येच्या काही विशिष्ट गटांच्या हितांचे समर्थन करण्यावर केंद्रित असते, ज्यांचे समर्थक दडपशाही मानतात किंवा त्यांच्या दृष्टीने दडपशाही मानणारे गट आणि त्यांचे थेट हितसंबंध यावर आक्रमण करतात.
‘सामाजिक न्याया’ची ही संकल्पना प्रत्येक नागरिकाला समजणे व त्याचे आकलन होणे अत्यंत गरजेचे आहे. ‘सामाजिक न्याया’चे आकलन करून त्यानुसार वर्तन करण्याचे प्रत्येकाने ठामपणे ठरविल्यास ‘अन्याय’ ही संकल्पनाच कालबाह्य ठरेल. किंबहुना ‘अन्याय’ ही संकल्पना पूर्णपणे नाहीशी होऊन ‘सामाजिक न्याय’ स्थापित व्हावा, याकरिता राजर्षी शाहू महाराज यांनी आपले उभे आयुष्य खर्ची केले. विविध कार्य व उपक्रमांच्या माध्यमातून कठोर निर्णयांच्या माध्यमातून सामाजिक अन्यायाला पाठिंबा देणार्यांच्या डोळ्यात झणझणीत अंजन घातले. समाजसुधारणेसाठी राज्यकारभारातील अनेक पारंपरिक नियम त्यांनी बदलले, सामाजिक न्यायाच्या दृष्टीने अनेक नवीन कायदे स्थापित केले आणि हे कायदे न पाळणार्यांवर कडक कारवाईदेखील केली.
शतकापूर्वी पुढे अनेक शतकांचा विचार करून निर्णय घेणारे क्रांतिकारी विचारांचे छत्रपती म्हणजे ‘लोकराजा शाहू महाराज’, अन्यायकारक व जुलमी बंधनांना आळा घालून महाराजांनी ‘सामाजिक न्याया’ची नवी संकल्पना केवळ मांडली नाही तर ती प्रत्यक्षात आणली आणि म्हणूनच की काय, आज बहुजन समाज मोकळा श्वास घेऊ शकतोय, हे अटळ सत्य आहे. आता आपल्यापैकी किती बहुजन बांधवांना याची जाणीव आहे, हा एक गहन प्रश्नच आहे. पण, आज ‘सामाजिक न्याय दिना’च्या निमित्ताने तरी राजर्षी शाहू महाराज, त्यांचं कार्य आणि ‘सामाजिक न्याया’ची संकल्पना समजून घेणं क्रमप्राप्त आहे.
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